रीवा। गुरुवार को रीवा पुलिस द्वारा बम डिफ्यूज मॉक ड्रिल किया गया। पहले तो लोगों को जानकारी नहीं हो पायी। क्योंकि रिहर्सल पूरा सच्चाई के साथ था। दो घंटे तक बस स्टैंड में लोगों का आना-जाना बंद रहा। दुकानें भी बदं करायी गई थी। मॉक ड्रिल सफल भी रहा। इस बात से लोगोंं का संतोष भी है कि शहर में यदि कहीं बम मिलता है तो रीवा पुलिस व बम निरोधक दस्ता कितनी तत्परता के साथ काम कर सकता है। यहां तक तो ठीक है लेकिन कोई यह पहचान कैसे करेगा कि विस्फोटक सामग्री रखी है। बम निरोधक दस्ता पुलिस तब काम कर पायेगी जब उसे जानकारी मिलेगी। देखा यह जा रहा है कि रीवा शहर में संजय गांधी अस्पताल, कोर्ट, कलेक्ट्रेट, विश्वविद्यालय, टीआरएस कालेज में जमकर भीड़ रहती है। 1200 बेड वाले एसजीएमएच में दिन रात हर समय लगभग तीन से चार हजार लोग रहते हैं। इसी तरह छुट्टियों के दिनों को छोड़ दिया जाय तो कोर्ट व कलेक्ट्रेट में आने जाने वालों का आंकड़ा हजार से अधिक रहता है। टीआरएस व एपीएस विवि में छात्रों की संख्या ही पांच-पांच हजार से अधिक होगी। यहां कौन आ रहा? कौन जा रहा है? कोई पूछने वाला नहीं है। हालांकि एसजीएमएच, टीआरएस कालेज, में प्राइवेट सुरक्षा गार्ड तैनात किए गए हैं लेकिन वह केवल डंडा लेकर उपद्रवियों से ही निबट सकते हैं। इसी प्रकार कलेक्ट्रेट व कोर्ट में होमगार्ड के साथ पुलिस कर्मी तैनात रहते हैं। लेकिन कहीं भी विस्फोटक सामग्रियों के पहचान का कोई इंतजाम नहीं है। भगवान न करे ऐसी परिस्थिति कभी आए, नहीं तो क्या हाला होगा कल्पना करना ही कठिन है। उल्लेखनीय है कि विस्फोटक सामग्रियों की पहचान के लिए मेटल डिटेक्टर से होती है। पीएम-सीएम, राज्यपाल या अन्य वीवीआइपी के आने पर तो इस तरह की व्यवस्था की जाती है। सभा में जाने के पहले मेटल डिटेक्टर से होकर गुजरना पड़ता है। यदि मेटल डिटेक्टर की व्यवस्था इन प्रमुख भीड़भाड़ वाले संस्थानों में कर दी जाय तो हद तक ऐसी घटनाओं के रोकथाम के लिए पूर्व सूचना पुलिस तक पहुंच सकती है। बतादें कि दहशतगर्द के निशाने पर ऐसे ही स्थल रहते हैं।
कोर्ट व टीआएस में कई बार आ चुकी हैं गोली चालन की घटनाएं
टीआरएस कालेज में छात्रों के बीच व कोर्ट परिसर के आसपास आपराधियों द्वारा गोली चालन की घटनाओं को अंजाम दिया जा चुका है। इसलिए इन दोनों जगहों में मेटल डिटेक्टर की महती आवश्यकता है।
एसजीएम में हो मेटल डिटेक्टर व्यवस्था
एसजीएमएच में सुरक्षा के नाम पर हर माह करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं लेकिन दो ढाई आने वाले मेटल डिटेक्टर की व्यवस्था नहीं है, जबकि इसकी सख्त जरूरत है। जिला प्रशासन और अस्पताल प्रबंधन को इस दिशा में ध्यान देने की जरूरत है।
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