रीवा। गर्भवती महिलाओं तथा नवजात शिशुओं की स्वास्थ्य रक्षा के लिए प्रदेश में रीवा जिले ने विशेष उपलब्धि तो हासिल की है लेकिन आंकड़े और हकीकत में बड़ा फर्क है। शायद यह उपलब्धि आंकड़ो से मिली है लेकिन जमीनी स्तर पर मिलने वाली सुविधाओं की बात की जाए तो गर्भवती महिलाओं के चिंहांकन से लेकर प्रसव व उसके बाद देखभाल तक बड़ी लापरवाही बर्ती जा रही है। शायद यही वजह है कि जिले में बीते 8 माह में हर सप्ताह गर्भवती महिलाओं की मौत हो रही है, यह मौत के आंकड़े स्वास्थ्य विभाग के डाटा में सुरक्षित हैं लेकिन जिम्मेदारों की ही माने तो कुछ ऐसे आंकड़े भी हैं जो प्राइवेट नर्सिंग होम या घर में डिलेवरी के बाद मौत के जानकारी न देने से अभी छिपे हुए हैं। दबी जुबान में कर्मचारी की बताते हैं कि हर सप्ताह दो-तीन महिलाएं दम तोड़ रही है। वहीं शिशुओं की सुरक्षा का दावा करना तो मजाकियां सा है क्योंकि बीते आठ माह में हर दो दिन में एक शिशु दम तोड़ रहा है, इसमें भी बहुत से आंकड़े ऐसे हैं जो छिपे हुए हैं या फिर फीड नहीं किए जा रहे है क्योंकि अस्पतालों में शिशुओं की मौत के बाद बिलखते परिजनों की चीख आपको रोजाना अस्पताल में सुनने को मिल ही जाएगी।
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131 नवजातों ने तोड़ दम
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ो की ही बात की जाए तो बीते आठ माह यानि कि 1 जनवरी 2022 से लेकर 31 अगस्त 2022 तक में 131 नवजातों की मौत हो चुकी है, यानि की हर दो दिन में औसतन एक मौत स्वास्थ्य विभाग के रिकार्ड के अनुसार हो रही है। इसके अलावा बहुत से ऐसी मौतें हैं जो प्राइवेट अस्पताल या घर में प्रसव के दौरान या फिर परिजनों की लापरवाही से हो जती हैं और इनकी जानकारी शासन तक नहीं पहुंच पाती है। आंकड़ो में भी हेराफेरी की बात दबी जुबान में स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी ही कर रहे हैं। बाहरी जिलो के नवजातों की मौत का आंकड़ा इससे अलग है। सूत्र बताते हैं कि हर दिन एक-दो मौत हो रही है।
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लापरवाही से 43 महिलाओं ने तोड़ा दम
बता दें कि गर्भवती महिलाओं के चिंहांकन से लेकर प्रसव व उसके बाद उनकी देखभाल तक हर तीन माह में उनकी जांच व उसकी रिपोर्ट प्रस्तुत की जानी चाहिए, इसके लिए मैदानी अमला तैनात है लेकिन ऐसा होता नहीं है, लापरवाही होने से गर्भवती महिलाओं में खून की कमी के चलते ज्यादा मौत होती है व कई मौते सही समय पर अस्पताल न पहुंच पाने से भी हुई हैं। बीते आठ माह की बात की जाए तो 43 मौतें हुई हैं। यह जिले की मौत का आंकड़ा है इसके अलावा संजय गांधी जीएमएच में अन्य जिलो से भी नवजात व महिलाओं को लाया जाता है जिनकी मौत का डाटा नहीं जोड़ा जाता है। बीते तीन माह में 15 मौतों का आंकड़ा स्वास्थ्य विभाग प्रस्तुत कर रहा है, लेकिन इसके बाद भी रीवा टॉप-2 में है यानि कि प्रदेश के अन्य जिलो में इससे ज्यादा मौतें हो रही है। हैरानी इस बात की है कि मौत के बाद कारणों का पता करने के लिए टीम को जांच करने का प्रवधान है लेकिन स्वास्थ्य विभाग इन मौतों का कारण क्या था मौखिक तो बता रहा है लेकिन लिखित तौर पर जानकारी इनके पास भी नहीं है।
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संस्थागत प्रसव की यह हकीकत
बता दें कि संस्थागत प्रसव के लिए बीते कई वर्षो से प्रयास किए जा रहे हैं, इसके लिए कई योजनाएं भी संचालित है व करोड़ो का बजट हर वर्ष फूंका जा रहा है लेकिन इसके बाद भी संस्थागत प्रसव के आंकड़े हैरान करने वाले है। स्वास्थ्य विभाग के रिकार्ड के अनुसार ही बीते 8 माह में करीब 40804 गर्भवती महिलाओं के रजिस्टे्रशन किए गए लेकिन इनमें से 25901 के ही प्रसव संस्थागत हुए बाकि की महिलाओं की डिलेवरी घर में ही हुई ऐसा कहना इसलिए गलत नहीं होगा क्योंकि प्राइवेट नर्सिंग होम के डिलेवरी का भी रिकार्ड स्वास्थ्य विभाग के पास दिया जाता है। इन आंकड़ो से संस्थागत प्रसव का भी अंदाजा लगाया जा सकता है।
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ग्रामीण अंचल पर लचर व्यवस्था
बता दें कि ग्रामीण अंचल पर ठीक से मानिटरिंग न होना व स्वास्थ्य केन्द्रों में प्रसव की व्यवस्था न होना व नवजात शिशुओं के उपचार की व्यवस्था न होना इन मौतों का बड़ा कारण है, नार्मल डिलवेरी तो जैसे तैसे ग्रामीण अंचल पर स्वास्थ्य केन्द्रों में हो जाती है लेकिन सीजेरियन की व्यवस्था नहीं है न ही महिला विशेषज्ञ पदस्थ हैं, जिससे उनको जिला अस्पताल या फिर एसजीएमएच में रेफर किया जाता है। ग्रामीण अंचल से दूरी तय करते हुए ही कई महिलाएं दम तोड़ देती हैं। उदाहरण के लिए बीते माह टटिहरा गांव निवासी दुर्गा कोल पित कमलेश कोल उम्र 22 वर्ष की मौत रास्ते में ही हो गई थी, इसी प्रकार पहाडिय़ा निवासी रश्मि साकेत पति अखिलेश केवट उम्र 26 वर्ष की मौत अस्पताल पहुंचने के पहले ही रास्ते में हो गई थी।
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एक बेड में 2-3 माताएं, दर्द से कराह रहीं…
वर्तमान में सुविधाओं की बात की जाए तो जिले के सबसे बड़े सेंटर जीएमएच में प्रसव के बाद माताओं के लिए एक बेड तक स्वास्थ्य विभाग नहीं उपलब्ध करा पा रहा है, यहां एक बेड में दो या फिर किसी-किसी में तीन माताओं को लेटने पर मजबूर किया जा रहा है। इससे भी भयावक स्थित यह है कि महिलओं को जमीन पर भी लेटा दिया जाता है। बुधवार को भी अस्पताल में भयावक स्थिति देखने को मिली माताएं दर्द से बेड में कराहती रहीं, हालांकि मरीज के परिजनों ने चिकित्सको व परिजनों की डर से खुलकर उनको न मिलने वाली सुविधाओं को लेकर बात नहीं की लेकिन एक शब्द में ही माताओं की जिंदगी रामभरोसे ही है उन्होंने वहां की स्थिति को बयां कर दिया। यहीं हाल जिला अस्पताल में भी देखने को मिल जाता है।
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ऐसे रोका जा सकता है मौतों को…
प्रसूताओं की शुरुआत से ही जांच होना चाहिए। जैसे अगर शुरुआत में बीपी के बारे में पता चलता है तो विशेषज्ञ की देखरेख में इलाज शुरू हो जाता है। इससे उसे सुरक्षित किया जा सकता है। ग्राम स्तर पर शिविर आयोजित किए जाते हैं। जहां जांच में प्रसूताओं का का हिमोग्लोबिन, यूरिन, ब्लड और वजन रिकार्ड में दर्ज किया जाता है। स्वास्थ्य केंद्रों पर एएनसी क्लीनिक में जांच होती है। महिलाओं का चैकअप किया जाता है। जांच का पूरा रिकार्ड रखा जाता है। इसके आधार पर उसका इलाज चलता है। इसमें आयरन से लेकर फोलिक एसिड की दवाइयां दी जाती हैं। इस तरह से जांचों के समय पर करवाने से प्रसूता को सुरक्षित किया जा सकता है। अब सप्ताह में एक दिन खुद डाक्टर क्लीनिक पर महिलाओं की जांच करते हैं। इसलिए प्रसूताएं समय-समय पर नियमित रूप से जांच करवाएं। प्रसूताओं के हर सप्ताह आशा और एएनएम से जांच करवाना चाहिए। रिकार्ड भी बनवाना चाहिए। गर्भावस्था के दौरान चार से पांच बार एएनएम और आशा से संपर्क करना चाहिए। इससे प्रसूता के स्वास्थ्य की जानकारी स्वास्थ्य विभाग को रहे।
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योजनाएं तो हैं लेकिन काम नहीं हो रहा
बता दें कि गर्भवती महिलाओं व शिशुओं के लिए प्रदेश व केन्द्र सरकार द्वारा जननी सुरक्षा योजना, प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना, प्रसूति सहायता योजना जैसी तमाम योजनाएं हैं जिसे स्वास्थ्य विभाग एवं महिला बाल विकास विभाग द्वारा संचालित किया जाता है लेकिन ठीक से काम और मानिटरिंग नहीं होने से खतरनाक आंकड़े सामने आ रहे हैं।
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वर्जन
गर्भवती महिलाओं व शिशुओं की रक्षा के लिए कई योजनाएं हैं, इनमें इनको जागरूक करने से लेकर देखभाल व इनकी पूरी सुरक्षा का कार्य किया जाता है। जागरूकता के आभाव में कुछ महिलाएं सही समय पर जांच नहीं कराती या फिर लापरवाही भी बरतती हैं जिससे मौतें भी हो रही है, ज्यादा से ज्यादा सुरक्षित व संस्थागत प्रसव का प्रयास किया जाता है। पहले से काफी सुधार भी हुआ है।
डॉ.एनएन मिश्रा, सीएमएचओ रीवा।
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